Buttons Back in Cars: कारों से हटेंगी बड़ी टचस्क्रीन, जान बचाने के लिए लौटेंगे बटन!

पिछले कुछ सालों में कारों का इंटीरियर पूरी तरह बदल गया है। पहले जहां डैशबोर्ड पर छोटे-छोटे बटन और नॉब होते थे, वहीं अब उनकी जगह बड़ी-बड़ी टचस्क्रीन ने ले ली है। आज की नई कारों में बैठते ही ऐसा लगता है जैसे सामने एक बड़ी टीवी स्क्रीन लगी हो। म्यूजिक से लेकर AC, वाइपर से लेकर हेडलाइट तक, लगभग हर काम अब टचस्क्रीन से किया जा रहा है। लेकिन यही आधुनिकता अब ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही है। इसी वजह से अब दुनिया भर में एक नई चर्चा शुरू हो गई है “Buttons Back in Cars”

टचस्क्रीन बनी ख़तरा

शुरुआत में कार कंपनियों ने टचस्क्रीन को लग्जरी और हाई-टेक फीचर के तौर पर पेश किया। बड़ी स्क्रीन देखने में आकर्षक लगती है और फीचर्स की लिस्ट भी लंबी हो जाती है। लेकिन असल जिंदगी में, खासकर ड्राइविंग के दौरान, यही टचस्क्रीन परेशानी का कारण बन रही है। ड्राइवर को बार-बार सड़क से नजर हटाकर स्क्रीन की तरफ देखना पड़ता है। सही मेन्यू ढूंढना, स्लाइडर चलाना और छोटे आइकन पर टैप करना, ये सब काम ध्यान भटकाते हैं। रिसर्च में सामने आया है कि ड्राइविंग के दौरान टचस्क्रीन का इस्तेमाल करना मोबाइल फोन चलाने जितना ही खतरनाक है। यानी जिस काम को कानूनन गलत माना जाता है, वही काम हम कार के अंदर लगे सिस्टम से रोज कर रहे हैं।

ANCAP का बड़ा फैसला

ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की स्वतंत्र सेफ्टी एजेंसी ANCAP Safety ने इस मुद्दे पर बड़ा कदम उठाया है। एजेंसी ने साफ कहा है कि साल 2026 से कार कंपनियों को हेडलाइट और वाइपर जैसे जरूरी फीचर्स के लिए टचस्क्रीन के बजाय फिजिकल बटन देने होंगे। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में सिर्फ क्रैश टेस्ट पास करना ही काफी नहीं होगा, बल्कि कार का इंटीरियर डिजाइन भी सेफ्टी रेटिंग तय करेगा। ANCAP का मानना है कि ड्राइविंग के दौरान जरूरी काम बिना देखे किए जा सकें, यही असली सुरक्षा है। अगर ड्राइवर को हेडलाइट ऑन करने या वाइपर चलाने के लिए स्क्रीन में मेन्यू ढूंढना पड़े, तो यह खतरे को बढ़ाता है।

यूरोप और बाकी देशों में भी उठी आवाज

सिर्फ ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ही नहीं, यूरोप में भी टचस्क्रीन के खिलाफ आवाज उठने लगी है। वहां की सेफ्टी एजेंसियां और कार एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जरूरत से ज्यादा डिजिटल कंट्रोल ड्राइवर को सड़क से दूर कर देते हैं। अब वहां भी यह चर्चा तेज हो गई है कि Buttons Back in Cars सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। भविष्य में कारों की सेफ्टी रेटिंग यह देखकर भी दी जा सकती है कि ड्राइवर कितनी आसानी से जरूरी फीचर्स कंट्रोल कर सकता है, बिना अपनी नजर सड़क से हटाए।

रिसर्च क्या कहती है

UK में हुई एक स्टडी के मुताबिक, जब ड्राइवर टचस्क्रीन का इस्तेमाल करता है तो उसका रिएक्शन टाइम काफी बढ़ जाता है। इसका मतलब यह है कि अगर अचानक सामने कोई खतरा आ जाए, तो ड्राइवर ब्रेक लगाने में देर कर सकता है। कुछ सेकंड की यह देरी जानलेवा साबित हो सकती है। वहीं अमेरिका में 92,000 कार मालिकों पर किए गए एक बड़े सर्वे में यह सामने आया कि लोग अपनी कार के टचस्क्रीन इन्फोटेनमेंट सिस्टम से सबसे ज्यादा परेशान हैं। लोगों का कहना है कि छोटे-छोटे कामों के लिए भी स्क्रीन पर कई बार टैप करना पड़ता है, जो ड्राइविंग के दौरान बहुत चिढ़ पैदा करता है।

बटन क्यों हैं ज्यादा सुरक्षित

पुराने जमाने के बटन और नॉब भले ही देखने में सिंपल लगते हों, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत है उनका इस्तेमाल। फिजिकल बटन की जगह ड्राइवर के दिमाग में बैठ जाती है। हाथ अपने आप सही जगह चला जाता है, बिना देखे। AC कम-ज्यादा करना हो, वॉल्यूम बढ़ाना हो या वाइपर चलाना हो, यह सब काम नजर सड़क पर रखते हुए किया जा सकता है। यही वजह है कि एक्सपर्ट्स मानते हैं कि रोज इस्तेमाल होने वाले फीचर्स के लिए बटन ही सबसे सही समाधान हैं। टचस्क्रीन का इस्तेमाल सिर्फ सेकेंडरी कामों के लिए होना चाहिए।

क्या वॉयस कमांड है सही विकल्प

कई कार कंपनियां यह दलील देती हैं कि वॉयस कंट्रोल से टचस्क्रीन की जरूरत कम हो जाती है। ड्राइवर बोलकर कार को कमांड दे सकता है। लेकिन रिसर्च यह भी बताती है कि वॉयस कमांड पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। भले ही आंखें सड़क पर हों, लेकिन दिमाग सिस्टम से बात करने में उलझ जाता है। इससे भी रिएक्शन टाइम प्रभावित होता है। यानी सिर्फ वॉयस कंट्रोल पर भरोसा करना सही नहीं माना जा रहा।

कार कंपनियों का बदलता रुख

अच्छी बात यह है कि कुछ बड़ी कार कंपनियों ने ग्राहकों की शिकायत और सेफ्टी एजेंसियों के दबाव को समझना शुरू कर दिया है। Volkswagen और Hyundai जैसी कंपनियां अब अपनी नई कारों में फिजिकल बटन और नॉब वापस ला रही हैं। इन कंपनियों का मानना है कि टेक्नोलॉजी तभी अच्छी है जब वह सेफ्टी के साथ आए। अब डिजाइन ऐसा किया जा रहा है कि जरूरी कंट्रोल बटन से हों और टचस्क्रीन का इस्तेमाल नेविगेशन या सेटिंग जैसे कामों के लिए किया जाए, वो भी बेहतर लेआउट के साथ।

आने वाले समय में कारें

आने वाले कुछ सालों में कारों का इंटीरियर फिर से बदलेगा। फर्क बस इतना होगा कि इस बार बदलाव सेफ्टी को ध्यान में रखकर होगा। Buttons Back in Cars अब सिर्फ एक चर्चा नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत बनती जा रही है। टचस्क्रीन पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन उसका रोल सीमित किया जाएगा। ड्राइवर को ऐसा माहौल मिलेगा जहां वह बिना परेशान हुए, सुरक्षित तरीके से गाड़ी चला सके।

आम ड्राइवर के लिए बदलाव

अगर आप रोज कार चलाते हैं, तो यह बदलाव आपके लिए राहत की खबर है। आपको छोटी-छोटी चीजों के लिए स्क्रीन से जूझना नहीं पड़ेगा। सड़क पर ध्यान रहेगा और ड्राइविंग ज्यादा आरामदायक होगी। सेफ्टी बढ़ेगी और एक्सीडेंट का खतरा कम होगा। यही वजह है कि Buttons Back in Cars को अब एक सही दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।

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कारों में टचस्क्रीन बनाम बटन: जरूरी जानकारी

बिंदुजानकारी
मुख्य मुद्दाड्राइविंग के दौरान टचस्क्रीन से बढ़ता खतरा
सेफ्टी एजेंसीANCAP (ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड)
नया नियम लागू2026 से
जरूरी फीचर्सहेडलाइट, वाइपर जैसे कंट्रोल बटन से
रिसर्च निष्कर्षटचस्क्रीन मोबाइल जितनी खतरनाक
सर्वे डेटाअमेरिका में 92,000 कार मालिक
कंपनियों की पहलVolkswagen, Hyundai ने बटन लौटाए
भविष्य की दिशाButtons Back in Cars

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